बर्बादी के अलावा जो एक और चीज़ हर जगह नज़र आती हैं वो है राशन की दुकान में लगी लंबी लाइनें. और लोगों को ढेरों शिकायते हैं.
मंगलपुर ग्राम पंचायत के प्रफुल्ल कुमार साहू कहते हैं कि किसी तरह की मदद से अलग से नहीं मिली है. बल्कि लोगों को पिछले दो माह से राशन नहीं मिला था वहीं दिया जा रहा है.
अजय भी प्रफुल की बातों की हामी भरते हैं.
दूसरे कई गांव के दौरों में हमने पाया कि वहां लोगों को प्रति व्यक्ति एक किलोग्राम चावल मिला था.
पोलिथीन का भी वही हाल है. कुछ गांवों में ये ज़रूरत से कम पहुंचा है तो जिन्हें इन सामग्रियों को बांटना है वो इस डर से ऐसा नहीं कर रहे कि इससे गांव में अफ़रातफ़री या हंगामा हो जाएगा.
उत्तर प्रदेश की ग़ाज़ीपुर लोकसभा सीट इस बार कई वजहों से चर्चा में है. यहां से केंद्र सरकार में रेलवे और
दूरसंचार जैसे अहम मंत्रालयों के राज्य मंत्री मनोज सिन्हा सांसद हैं.
यह सीट इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ख़ुद मनोज सिन्हा के नामांकन में उनके साथ रहे.2014 में नरेंद्र मोदी की लहर में मनोज सिन्हा यहां से महज़ 33 हज़ार वोटों के अंतर से जीते थे. इस बार उनका मुक़ाबला हाथी के निशान पर सपा-बसपा गठबंधन से लड़ रहे अफ़ज़ाल अंसारी से है.
अफ़ज़ाल उसी अंसारी परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं जिसका पूर्वांचल के इस इलाक़े में मज़बूत असर माना जाता है.
अफ़ज़ाल अंसारी के छोटे भाई मुख़्तार अंसारी बाहुबली कहे जाते हैं और 2017 विधानसभा चुनाव में वह जेल में रहते हुए पड़ोस की मऊ विधानसभा से विधायक चुने गए थे.
ख़बरें यह भी रहीं कि 2017 विधानसभा चुनाव में अंसारी परिवार अपने क़ौमी एकता दल का सपा में विलय चाहता था लेकिन मुख़्तार अंसारी की दाग़ी छवि की वजह से अखिलेश यादव इस पर तैयार नहीं हुए.
इसके बाद अंसारी बंधुओं को बसपा प्रमुख मायावती ने अपना लिया.
लेकिन इस बार सपा-बसपा गठबंधन से अंसारी परिवार के लिए भी हालात बदले हैं. 13 मई को ही अखिलेश यादव ने ग़ाज़ीपुर में रैली करके अफ़ज़ाल अंसारी का प्रचार किया.
अफ़ज़ाल अंसारी ग़ाज़ीपुर से एक बार साल 2004 में मनोज सिन्हा को पटखनी दे चुके हैं. इस बार वोटरों का गणित उनके पक्ष में माना जा रहा है.
ग़ाज़ीपुर के लोहिया भवन स्थित चुनाव कार्यालय पर जब हमारी उनसे मुलाक़ात हुई तो वो एक राष्ट्रीय चैनल को एक लंबा इंटरव्यू देकर उठे थे.
हमने उनसे संसदीय क्षेत्र के साथ-साथ, अंसारी परिवार की राजनीति, अखिलेश यादव की पुरानी नाराज़गी और हिंदुत्व की सियासत समेत तमाम मुद्दों पर बात की.
पिछली बार मनोज सिन्हा सिर्फ 33 हज़ार वोटों से जीत पाए थे. तब कई उम्मीदवार उनके सामने थे. इस बार गणित आपके पक्ष में तो लग रहा है पर मनोज सिन्हा कह रहे हैं कि चुनाव गणित नहीं होता, केमिस्ट्री होती है. तो केमिस्ट्री क्या है?
उनकी केमिस्ट्री वो बता सकते हैं. मैं इस सिलसिले में सिर्फ़ ये कह सकता हूं कि ग़ाज़ीपुर की लोकसभा के लिए न मनोज सिन्हा का चेहरा नया है, न अफ़ज़ाल अंसारी का चेहरा नया है. एक बात हुई है जिससे उनका मनोबल बढ़ा हुआ है. पिछले लोकसभा चुनाव में पहली बार ग़ाज़ीपुर के चुने हुए सांसद को देश की सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होने का मौक़ा मिला.
क्यों करें? उस पर निर्णय देगी ग़ाज़ीपुर की जनता जो कॉपी जांचने का अधिकार रखती है. वो 19 तारीख़ को कॉपी जांचेगी और नतीजा 23 को देगी. तो विकास पुरुष सच बोलता था या विकास पुरुष ने ढोंग रचा था विकास का, ये सामने आएगा.
विकास पुरुष के सामने कुछ सवाल हैं जो आपकी हेडिंग नहीं बनेंगे. ग़ाज़ीपुर जनपद में नंदगंज में शराब का कारख़ाना चलेगा लेकिन वहां शुगर मिल नहीं चलेगी. ग़ाज़ीपुर में बड़ौरा सूती कताई मिल 1985 में स्थापित हुई थी, जब मैं विधायक हुआ था. वो मिल बंद पड़ी है.
हम विकास पुरुष हैं. हम केंद्र सरकार के हिस्सेदार हैं. संचार मंत्रालय इनके पास हैं. राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इनका पर्चा भरवाता है. मोदी के आंखों के तारे ये हैं. रेल राज्य मंत्रालय इनके पास है.
बता तो रहे हैं कि भारत में रेलवे की लाइन अंग्रेज़ों ने बिछाया था. भारतवर्ष में रेलवे अंग्रेजों की देन है तो क्या अंग्रेजों की सरकार फिर से बनाएंगे? सरकार का व्यवहार क्या है जनता के प्रति. रेल प्लेटफार्म बना हुआ है, रेल चल रही है आपने बस रोगन लगा दिया है. आप टिकट कराइए. आज आठ सौ का मिलेगा और चार दिन बाद करेंगे तो बारह सौ का मिलेगा. ये सौदागरी है जनता के साथ.
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