Friday, August 31, 2018

ब्रैड पिट के ख़िलाफ़ कोर्ट पहुंची एंजेलीना जोली

अमरीकी अभिनेता ब्रैड पिट और अभिनेत्री एंजेलीना जोली 2016 में दो साल की शादी के बाद अलग हो गए थे. अब एंजेलीना एक बार फिर पिट को कोर्ट में घसीट लाई हैं.
एंजेलीना जोली ने ब्रैड पर आरोप लगाया कि तलाक का केस दायर करने के बाद से पिट उन्हें बच्चों का ख़र्चा नहीं दे रहे हैं.
ब्रैड पिट ने इन आरोपों को ख़ारिज किया है. उनके वकील ने बुधवार को कोर्ट में बताया कि पिट एंजेलीना को अबतक 13 लाख डॉलर से ज़्यादा की रकम दे चुके हैं. इसके अलावा जोली को घर ख़रीदने में मदद करने के लिए उन्होंने 80 लाख डॉलर का कर्ज़ भी लिया है.
इससे पहले मंगलवार को जोली के वकील ने कहा था कि जब से जोली ने तलाक के लिए कोर्ट केस फ़ाइल किया है, तबसे पिट ने बच्चों के ख़र्चे के लिए ना के बराबर पैसा दिया है.
एंजेलीना जोली और ब्रैड पिट साल 2005 से साथ थे. नौ साल बाद 2014 में दोनों शादी के बंधन में बंध गए.
पिट के वकील ने आरोप लगाया कि जोली मीडिया कवरेज के लिए झूठे दावे कर रही हैं. हालांकि जोली की ओर से इसपर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. जेलीना जोली के वकील ने कहा था, "बच्चों के भरन-भोषण का ख़र्चा देना पिट का वैधानिक कर्तव्य है. जोली से अलग होने के बाद से पिट ने बच्चों के लिए कोई ख़र्चा नहीं दिया है."
कोर्ट में जमा किए गए दस्तावेज़ों में उन्होंने कहा, "डेढ साल से ज़्यादा समय से बच्चों का ख़र्चा नहीं दिया जा रहा. इसलिए जोली ने ख़र्चे की मांग करते हुए ये केस फ़ाइल किया है."
जोली ने तलाक़ का फ़ैसला लेने की वजह बढ़ती दूरियों और मतभेदों को बताया था. इसके बाद बच्चे की कस्टडी को लेकर भी दोनों के बीच महीनों विवाद होता रहा था.
पिट पर बच्चों के शोषण के भी आरोप लगे थे. कहा गया था कि कुछ दूसरे बच्चों के सामने उन्होंने बच्चों पर आपा खो दिया था. लेकिन जांच के बाद ये आरोप झूठे पाए गए. मुल्क' एक फ़िल्म की कसौटी पर कैसी है यह दूसरी बहस हो सकती है, लेकिन विषयवस्तु में तार्किकता, ऐतिहासिकता, तथ्यपरकता और मानवीय पक्षों के लिहाज से यह एक ज़रूरी फ़िल्म है. देश भक्ति और धर्म के घालमेल पर यह फ़िल्म सार्थक बहस छेड़ती है जो मौजूदा वक़्त में एक प्रासंगिक विषय है.
एक घर के आंगन में परिवार के कुछ लोग बैठे सुख-दुख साझा कर रहे हैं. तभी बाहर से कई पत्थर आंगन में गिरते हैं. 'गद्दार..गद्दार' की आवाज़ें आ रही हैं.
बताइए ये घर किस धर्म के लोगों का है? जवाब थोड़ा मुश्किल है? एक हिंट लीजिए. हिंट ये कि घर के लोग जब बाहर निकलते हैं तो दीवार पर लिखा पाते हैं- गो टू पाकिस्तान.
क्या अब जवाब मिला?
फ़िल्म मुल्क इसी सवाल का जवाब देती है और ये जवाब किसी एक धर्म के लिए नहीं है. ये जवाब है उन करोड़ों हिंदू, मुसलमानों नौजवानों के लिए, जिनकी बाइक पर बीते कुछ सालों में 'प्लेबॉय, डैड्स गिफ्ट, दिल चीरते तीर, लव किल्स' जैसे स्टिकरों की जगह किसी धर्म का एक ख़ास रंग का झंडा आकर लग गया है, भगवा या हरा.
सब अपनी पहचान बचाए रखने की लड़ाई में लग गए हैं. केसरिया और हरे रंग के बीच में जो चक्र होता है, वो मानो फिज़ाओं में घूम रहा है. कई बार ये पहचान की लड़ाई उस पैने हो चुके चक्र से अपनी गर्दन बचाने की कोशिश लगती है.
एक 'आतंकी' का निर्दोष परिवार. इसके पास ये सबूत नहीं है कि वो देशभक्त है. हां, ऐसे हालात ज़रूर हैं जो ये बताते हैं कि वो टूट सकते हैं.
आतंकवाद की परिभाषा क्या है. मुल्क फ़िल्म में जो बताने की कोशिश हुई वो वाली या गूगल पर सर्च करने पर जो आती है, वो वाली.
या फिर वो जिसे जाने-अंजाने में ज़िंदगी में कभी हम में से कइयों ने भी सच माना था. दाढ़ी, सफेद टोपी, टखने दिखाता उठा पायजामा या बुर्के में जाती औरत.
लेकिन फिर वो लोग कौन हैं, जो शहर में दिनदहाड़े गर्दन पर एक रंग का गमछा पहने दूसरे रंग के लिबास पर कुल्हाड़ी चला देते हैं. हम सबकी आतंकवाद की परिभाषा धुंधली है.
इसमें दानिश जावेद (रजत कपूर) जैसे लोग भी शामिल हैं, जो एक किस्म की चुप्पी ओढ़े जान पड़ते हैं. इस चुप्पी की पहली परत को उठाओ तो दिखाई देता है कि हर तरफ़ 'वो और हम' है. दानिश जावेद वो नहीं, हम होना चाहता है. उसे शायद मालूम चल चुका है कि 'वो' होने के क्या नुक़सान हैं.

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